Let’s Change Your Thought About Astrology

Let’s Change Your Thought About Astrology || Lagnesh, Panchmesh & Navmesh ke fal #HoroscopeAnalysis

जन्म लग्न कुंडली में लग्नेश (लग्न भाव का स्वामी), पंचमेश (पंचम भाव का स्वामी) तथा नवमेश (नवम भाव का स्वामी) थ्योरी के अनुसार योगकारक ग्रह (शुभ ग्रह) बनते हैं । यदि लग्नेश, पंचमेश, नवमेश लग्न कुंडली में कहीं भी अच्छे भाव (पहले, दूसरे, चैथे, पांचवें, सातवें, नौवें, दशवें, ग्यारहवें भाव) में बैठते हैं और ग्रह अपनी नीच राशि में नहीं है तोह अच्छा फल देने के लिए बाध्य हो जाता है । इन भावों में बैठे लग्नेश, पंचमेश तथा नवमेश का रत्न भी धारण किया जा सकता है ।


यदि लग्नेश, पंचमेश तथा नवमेश सूर्य से अस्त हो जाए तोह इन ग्रहों का रत्न धारण करना अतिआवश्यक हो जाता है क्यूंकि अस्त ग्रह की किरणें हमारे शरीर तक नहीं पहुँचती हैं ।
यदि लग्नेश, पंचमेश तथा नवमेश सूर्य से अस्त हो कर कुंडली के तीसरे, छठे, आठवें, बारहवें भाव तथा नीच राशि में बैठे हों तब भी इन ग्रहों का रत्न बुरे भाव में भी धारण किया जा सकता है और उनसे लाभ लिया जा सकता है क्यूंकि अस्त ग्रह की किरणें हमारे शरीर तक नहीं पहुँचती हैं ।

नियम:

1 लग्न कुंडली का योगकारक ग्रह (थ्योरी अनुसार) जहाँ बैठता है, जहाँ देखता है और गोचर में जहाँ जाता है उस भाव की वृद्धि कर देता है यदि लग्न कुंडली का योगकारक ग्रह कुंडली के तीसरे, छठे, आठवें तथा बारहवें भाव में बैठता है तोह इन भावों की वृद्धि कर देता है और जिस भाव को देखता है उस भाव की अशुभ वृद्धि कर देता है ।

2 लग्न कुंडली का मारक ग्रह (थ्योरी अनुसार) जहाँ बैठता है, जहाँ देखता है और गोचर में जहाँ जाता है उस भाव का नुकसान करता है ।

लग्नेश का तीसरे भाव में फल:


किसी भी लग्न कुंडली में यदि लग्नेश (जातक स्वम) कुंडली के तीसरे भाव में उदय अवस्था (सूर्य से दूरी बनाकर बैठा है) तोह ऐसा लग्नेश अशुभ माना जाता है क्यूंकि कुंडली का तीसरा भाव अच्छा नहीं माना जाता है । तीसरे भाव में बैठ कर ग्रह जातक के परिश्रम, फिजूल की मेहनत को बढ़ा देता है, सामाजिक क्षेत्र में अशुभ की वृद्धि कर देता है । जातक को बहुत मेहनत के बाद ही कामयावी मिल पाती है तथा जातक का अपने मित्रों, सामाजिक क्षेत्र के लोगों के साथ काफी मित्रवत व्यहवार करने वाला बना देता है । जातक अपने मित्रो के लिए कुछ भी कर सकता है । लेकिन वही समाज के लोग और मित्र गण बुरे समय में जातक का साथ छोड़ देते हैं क्यंकि जातक स्वम तीसरे भाव में बैठ कर अशुभ हो जाता है । जातक को हमेशा सामाजिक क्षेत्र के लोगों से निराशा ही हाथ लगती है ।

कुंडली का तीसरा भाव भ्राता भाव भी कहलाता है यदि लग्नेश कुंडली के तीसरे भाव में बैठता है तोह जातक का भाइयों के साथ भावुक सम्बन्ध बना देता है । जातक भाइयों की बहुत मदद भी करता है लेकिन तीसरे भाव में अशुभ हो जाने से अपने भाइयों से ही समय के साथ – साथ निराशा हाथ लगने लगती है । सामजिक क्षेत्र के लोग जातक को सिर्फ अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करते है । इन सभी परिणामों में कमी या अधिकता देखने को मिल सकती है क्यूंकि प्रत्येक कुंडली में ग्रहों का अंश अलग-अलग होता है । यदि लग्नेश का बल बहुत ज्यादा हुआ तो जातक के साथ उपरोक्त परिणाम बहुत तेज और अधिक देखने को मिलते हैं मतलब जातक की परेशानी बहुत बढ़ जाती हैं । यदि तीसरे भाव में बैठे लग्नेश का बल कम है तोह जातक को तीसरे भाव से सम्बंधित परेशानी कम आएँगी।

जातक को कभी भी पैसे उधार नहीं देने चाहिए क्यूंकि तीसरे भाव में बैठने से लग्नेश अशुभ हो चूका है मतलब लग्नेश बुरा फल देने के लिए बाध्य हो गया है । यदि जातक किसी इन्सान को पैसे उधार दे देता है तोह जातक को पैसे वापस लेने में बहुत परेशानी होती है, कभी कभी तोह देखा गया है कि जातक के पैसे डूब जाते हैं ।

यदि लग्नेश तीसरे भाव में उदय अवस्था में बैठा है तोह लग्नेश का रत्न भूल कर भी धारण न करें । क्यूंकि रत्न का काम होता है ग्रह से आने वाली किरणों को शरीर में बढ़ा देना । पहना हुआ रत्न जातक के शरीर में अशुभ लग्नेश का बल बढ़ा देगा और जातक के जीवन में परेशानी और ज्यादा बढ़ा देगा क्यूंकि वह रत्न तीसरे भाव की वृद्धि कर देगा जोकि जातक के लिए अच्छा नहीं माना जायेगा । बहुत मेहनत के बाद भी जातक के पास पैसे बहुत कम आएंगे।

तीसरे भाव में बैठे लग्नेश का रत्न धारण करने से कुंडली मजबूत तोह हो जाएगी लेकिन आपकी परेशानी भी साथ ही साथ बढ़ जाएँगी । इसलिए तीसरे भाव में बैठे ग्रह (उदय अवस्था का ग्रह) का रत्न पहनकर बल न बढ़ाएं । उस ग्रह का सिर्फ पाठ-पूजन, मंत्रजाप, व्रत, दान आदि करके उस ग्रह की शुभता को बढ़ाना है और अशुभ प्रभाव को कम करना है ।

तीसरे भाव में बैठे लग्नेश की सातवीं दृष्टि भाग्य भाव (नवम भाव) पर पड़ेगी तोह जातक का भाग्य भी देरी से साथ देगा, बहुत मेहनत करने के बाद ही भाग्य का साथ मिलेगा । और जातक पिता की परेशानी भी बढ़ा देता है क्यूंकि लग्नेश की अशुभ दृष्टि पड़ रही है जिसके कारण पिता के जीवन में भी परिश्रम बहुत अधिक बढ़ जाता है और पिता जी आपकी कभी भी प्रशंशा नहीं करेंगे चाहे जातक जितना मर्जी मेहनत कर ले ।

लग्नेश का छठे भाव में फल:


आप भली भाँति जानते हैं कि लग्नेश कुंडली का थ्योरी के अनुसार अति योगकारक माना जाता है और कुंडली का छठा भाव रोग भाव कहलाता है, जिसे कोई भी इन्सान अपने जीवन में नहीं चाहता है ।

यदि लग्नेश जन्म लग्न कुंडली में उदय अवस्था में छठे भाव में बैठता है तोह लग्नेश योगकारक ग्रह होने के कारण छठे भाव की वृद्धि कर देता है और छठे भाव (बुरा भाव) में बैठ कर अपनी योगकारिता खो देता है और एक मारक ग्रह की तरह ही फल देने लगता है । ठीक उसी तरह यदि कोई समाज का साधु – सन्त किसी शराब के ठेके पर जा कर बैठता है तोह ऐसा साधु अशुभ माना जाता है क्यूंकि वह साधु गलत स्थान पर बैठा है और गलत चीजें करने के लिए बाध्य हो जाता है ।
कुंडली के छठे भाव से हम रोग, कर्ज, शत्रु, कोर्ट केस, लम्बी चलने वाली बीमारी, मुकाबला, नौकरी, कम्पटीशन के पेपर देना, गुस्सा, दुर्घटना आदि देखते हैं । यदि लग्नेश छठे भाव में बैठेगा तोह इन सब चीजों की वृद्धि कर देगा अर्थात रोग, कर्ज, शत्रु, कोर्ट केस, लम्बी चलने वाली बीमारी, गुस्सा, दुर्घटना में वृद्धि कर देगा और जातक के जीवन को इन सब परेशानियों में अपने बलाबल के अनुसार डाल देगा ।

कुंडली के छठे भाव से हम नौकरी, कम्पटीशन के पेपर देना आदि चीजे भी देखते हैं और जब लग्नेश छठे भाव में आकर बैठेगा तोह नौकरी, कम्पटीशन के पेपर देना आदि में वृद्धि कर देगा अर्थात आपकी नौकरी में वृद्धि कर देगा, नौकरी में तरक्की कर देगा और कम्पटीशन के पेपर्स में सफलता दिला देगा क्यूंकि वह ग्रह छठे भाव की वृद्धि कर रहा है ।

यदि जातक छठे भाव में बैठे लग्नेश का रत्न धारण कर लेता है तोह रत्न जातक के शरीर में अशुभता की किरणें बढ़ा देगा क्यूंकि छठे भाव में बैठने से ग्रह अपनी योगकारिता खो देता है और मारक (अशुभ) किरणों में वृद्धि कर देता है । जब यही अशुभ किरणें जातक के शरीर में बढेंगी तोह नौकरी में तरक्की जरूर कर देंगी लेकिन साथ ही साथ रोग, कर्ज, शत्रु, कोर्ट केस, लम्बी चलने वाली बीमारी, गुस्सा, दुर्घटना आदि जातक के जीवन में बढ़ा देगा और जातक के जीवन को कष्टों से भर देगा और कोई भी इन्सान नहीं चाहता है कि रोग, कर्ज, शत्रु, कोर्ट केस, लम्बी बीमारियाँ उसके जीवन में बढ़ें ।

यदि कुंडली का कोई भी योगकारक ग्रह (थ्योरी के अनुसार) उदय अवस्था में छठे भाव में बैठता है तोह उस ग्रह का रत्न धारण नहीं किया जाता है क्यूंकि रत्न का सिर्फ एक ही काम है कि ग्रह से आने वाली किरणों को शरीर में बढ़ा देना । जब ग्रह छठे भाव में उदय अवस्था में बैठ कर अशुभ हो गया है अर्थात मारक ग्रह हो गया है तोह उस ग्रह से अब आपके शरीर पर अशुभ (नकारात्मक) किरणें पड़ेंगी । इसलिए रत्न धारण करने की सलाह नहीं दी जाती है । ग्रह की अशुभता को कम करने के लिए पाठ – पूजन, मंत्रजाप, व्रत, सिमरण आदि किया जाता है ।

यदि छठे भाव में बैठे लग्नेश का दान करेंगे तोह लग्नेश का बल कम हो जायेगा और ग्रह की अशुभता कम हो जाएगी, जिसकी वजह से आपकी ग्रोथ धीमे धीमे होगी लेकिन आप खुश रहेंगे क्यूंकि आपके जीवन में रोग, कर्ज, शत्रु, कोर्ट केस, लम्बी बीमारियाँ आदि नहीं बढेंगी । इसलिए हमारे अनुसन्धान के हिसाब से आपको व्रत, मंत्रजाप और दान अवश्य करना चाहिए । और नौकरी में अच्छी ग्रोथ के लिए दूसरे योगकारक ग्रहों की मदद लेनी चाहिए ।

छठे भाव में बैठे लग्नेश की दृष्टि जब बारहवें भाव पर पड़ेगी तोह जातक के खर्च, अस्पताल के खर्च, फिजूल के खर्च, जेल यात्रा के योग में वृद्धि कर देगा । इसलिए छठे भाव में उदय अवस्था में बैठे लग्नेश का रत्न धारण नहीं करना चाहिए । यदि जातक रत्न धारण करके नौकरी में वृद्धि करेगा तोह उसके साथ साथ कर्ज, खर्च, अस्पताल खर्च, लम्बी चलने वाली बीमारी, जेल यात्रा आदि बुरी चीजे अपने जीवन में बढ़ा लेगा और जीवन को कष्टों से भर लेगा ।

यदि लग्नेश सूर्य से अस्त होकर कुंडली के किसी भी भाव में बैठता है तोह ग्रह का अशुभ प्रभाव नहीं पड़ता है क्यूंकि ग्रह से किसी भी तरह की किरणें नहीं पहुंच रही हैं । ऐसे में लग्नेश का बुरे भाव में भी रत्न धारण किया जा सकता है और उस से लाभ लिया जा सकता है ।

लग्नेश का अष्ठम भाव में फल:
किसी भी लग्न कुंडली में यदि लग्नेश (जातक स्वम) अष्ठम भाव में उदय अवस्था (सूर्य से दूरी बनाकर बैठा है) में बैठता है तोह ऐसा लग्नेश अशुभ माना जाता है क्यूंकि कुंडली का अष्ठम भाव (मृत्यु भाव) अच्छा नहीं माना जाता है । अष्ठम भाव में बैठकर लग्नेश अपनी योगकारिता खो देता है और जातक के जीवन को परेशानियों से भर देता है ।

लग्नेश कुंडली का योगकारक ग्रह (थ्योरी के अनुसार) होता है जब योगकारक ग्रह अष्ठम भाव में बैठता है तोह अष्ठम भाव की वृद्धि कर देता है । अष्ठम भाव से मृत्यु, मृत्यु तुल्य कष्ट, मानसिक परेशानी, हर कामकाज में परेशानी, अड़चने, ससुराल, पैतृक संपत्ति, शौच स्थान, प्रसिद्धि, गहरी खोज, न दिखने वाली बीमारियाँ आदि देखते हैं । जब ग्रह अष्ठम भाव में बैठकर अशुभ हो जाता है और कुंडली का योगकारक ग्रह होने के कारण वृद्धि करना शुरू कर देता है जिसके कारण जातक को मानसिक परेशानी, मृत्यु समान कष्ट, हर कामकाज में समस्या, देरी से काम बनना, हमेशा कुछ न कुछ समस्या लगे रहना आदि चीजें बढ़ा देता है । मतलब जातक के जीवन को कष्टों से भर देता है । ग्रह अपने बल के अनुसार ही वृद्धि करेगा यदि ग्रह का बल बहुत ज्यादा है तोह समस्याएँ भी बहुत ज्यादा बढ़ जाएँगी और ग्रह का बल कम है तोह समस्याएँ कम बढ़ेंगी ।

अष्ठम भाव कुंडली का आयु का भाव भी कहलाता है जब लग्नेश या योगकारक ग्रह अष्ठम भाव में बैठता है तोह आयु की वृद्धि कर देता है मतलब जातक की आयु को बढ़ा देता है । यदि जातक की किसी ग्रह की वजह से दुर्घटना हो जाती है तोह यही लग्नेश अष्ठम भाव में बैठकर उसकी आयु की रक्षा करता है उसकी मृत्यु नहीं होने देता है लेकिन अष्ठम भाव में बैठने से दूसरी तरह की और समस्याएँ जातक को लगी ही रहती हैं जैसे कि मानसिक परेशानी, मृत्यु समान कष्ट, हर कामकाज में समस्या, देरी से काम बनना, हमेशा कुछ न कुछ समस्या लगे रहना, न दिखने वाली बीमारियाँ बढ़ने लगती हैं क्यूंकि योगकारक ग्रह अष्ठम भाव में आया है ।

अष्ठम भाव में बैठे लग्नेश का या किसी भी योगकारक ग्रह का उदय अवस्था में रत्न धारण नहीं किया जाता है । अष्ठम भाव में बैठा ग्रह सिर्फ आपकी आयु की रक्षा करेगा लेकिन परेशानियों/कष्टों को आपके जीवन में भर देगा । यहाँ बैठे ग्रह का सिर्फ पाठ – पूजन, मंत्रजाप, हवन, व्रत, दान आदि करके ग्रह के प्रभाव को शुभ किया जाता है और मारक किरणों को दान की मदद से शरीर से कम किया जाता है ।

अष्ठम भाव में बैठे ग्रह की सातवीं दृष्टि आपके दूसरे भाव पर पड़ती है जिसके कारण दूसरे भाव की अशुभ वृद्धि कर देता है जैसे कि पारिवारिक कलह कलेश, परिवार से दूर जाना, बैंक में धन नहीं जोड़ पाता है, पैसे फसने का योग बना देता है, ऐसे में किसी को उधार दिया हुआ पैसा बहुत मुश्किल से वापस आता है क्यूंकि धन की हानि हो रही है, साथ ही साथ पूरे वरिवार की तरक्की नहीं होने देता है क्यूंकि अष्ठम भाव में बैठने से ग्रह अशुभता के फल देने लगता है । यदि जातक ऐसे में रत्न धारण कर लेता है तोह परेशानियाँ और ज्यादा बढ़ जाती हैं । अष्ठम भाव में लग्नेश का पहना हुआ रत्न आपकी आयु की रक्षा जरूर कर लेगा लेकिन पूरे जीवन को कष्टों से भर देगा । इसलिए अष्ठम भाव में उदय अवस्था में बैठे ग्रह का रत्न भूल कर भी धारण न करें । आयु की रक्षा के लिए ग्रह का पाठ पूजन, मंत्रजाप और व्रत कर सकते हैं और अपने जीवन को सुखमय बना सकते हैं ।

लग्नेश का बारहवें भाव में फल:
किसी भी लग्न कुंडली में यदि लग्नेश (जातक स्वम) बारहवें भाव में उदय अवस्था (सूर्य से दूरी बनाकर बैठा है) में बैठता है तोह ऐसा लग्नेश अशुभ माना जाता है क्यूंकि कुंडली का बारहवाँ भाव (खर्च, जेल यात्रा) अच्छा नहीं माना जाता है । बारहवें भाव में बैठकर लग्नेश अपनी योगकारिता खो देता है और जातक के जीवन को परेशानियों से भर देता है ।

लग्नेश कुंडली का योगकारक ग्रह (थ्योरी के अनुसार) होता है जब योगकारक ग्रह बारहवें भाव में बैठता है तोह बारहवें भाव की वृद्धि कर देता है । बारहवें भाव से जातक का खर्च, अस्पताल का खर्चा, जेल – यात्रा, विदेश में बसना, शैया – सुख, मोक्ष आदि देखते हैं । लग्नेश बारहवें भाव में बैठकर अशुभ हो जाता है और कुंडली का योगकारक ग्रह होने के कारण वृद्धि करना शुरू कर देता है जिसके कारण जातक का खर्च, अस्पताल का खर्चा बढ़ा देता है । मतलब जातक पूरी जिन्दगी भर अपने खर्चों से परेशान रहता है जिसके कारण जातक कहीं न कहीं अपने ऊपर कर्ज बढ़ा लेता है । कर्ज की स्थित इसलिए बनने लगती है क्यूँकि ग्रह बारहवें भाव में बैठकर अपनी सातवीं दृष्टि से छठे भाव को देखता है जिसके कारण लग्नेश छठे भाव की अशुभ वृद्धि कर देता है । छठे भाव की वृद्धि होने के कारण जातक के ऊपर कर्ज बढ़ने लगता है और जातक मानसिक रूप से बीमार होने लगता है मतलब रोग बढ़ने लगते हैं ।
जब छठे भाव की वृद्धि होती है तोह जातक का सिर्फ एक काम अच्छा होता है कि उसकी नौकरी में वृद्धि हो जाती है । जातक यदि नौकरी में है तोह जातक को मदद मिलती रहती है और यदि जातक व्यवसाय से जुड़ा हुआ है तोह परेशानी बढ़ जाती है । क्यूँकि बारहवें भाव में बैठा लग्नेश सिर्फ नौकरी में मदद करेगा, व्यवसाय में नहीं ।

आप सभी भलीभाँत जान चुके हैं कि बारहवाँ भाव विदेश में बसने का भी होता है । यदि लग्नेश (जातक स्वम) बारहवें भाव में बैठता है तोह कहीं न कहीं विदेश में बसने के योग भी बनते हैं और जातक यदि नौकरी करे तोह विदेश में नौकरी करता है और बाद में विदेश में ही बस जाता है क्यूँकि जातक स्वम उठकर विदेश के भाव में जा कर बैठा है इसलिए विदेश में बसने व विदेश में नौकरी करने के योग बना देता है । जितना ज्यादा ग्रह का बल होगा उतना ज्यादा प्रबल योग बनेंगे ।

यदि लग्नेश बारहवें भाव में बैठता है और जातक अपनी जन्म भूमि के आस पास ही बस जाता है तोह जातक को जीवन में ज्यादा परेशानी होती हैं क्यूँकि जातक के घर से दूर रहने के योग हैं ।
नियम: यदि लग्नेश का कोई भी सम्बन्ध बारहवें भाव से बन जाये तोह जातक के विदेश में बसने या जन्म भूमि से दूर रहने का योग बनता है ।

यदि लग्नेश बारहवें भाव में उदय अवस्था में बैठा है तोह किसी भी जातक को लग्नेश का रत्न पहनने की सलाह नहीं दी जाती है क्यूँकि ग्रह बारहवें भाव में बैठने से अशुभता के फल देता है । जब एक बार ग्रह अपनी स्थित के अनुसार मारक ग्रह बन जाता है तोह उस ग्रह से हमारे शरीर पर नकारात्मक किरणें पड़ती हैं । जैसे ही हम ऐसे ग्रह का रत्न धारण करते हैं तोह उस ग्रह से हमारे शरीर पर नकारात्मक किरणें और ज्यादा पड़ने लगती हैं ! जिसके कारण परेशानी कम होने के वजाह बढ़ जाती हैं ।

यदि जातक बारहवें भाव में बैठे लग्नेश का रत्न धारण करता है तोह जातक का खर्च तोह बढ़ेगा ही साथ ही साथ उसके अस्पताल जाने के योग बन जायेंगे मतलब जातक के साथ दुर्घटना होने के योग बन जायेंगे क्यूँकि ग्रह की सातवीं दृष्टि छठे भाव पर पड़ेगी ।

यदि किसी जातक के बारहवें भाव में लग्नेश बैठे हैं और लग्नेश का बल कम है और जातक विदेश में बसना चाहता है या विदेश में रहकर नौकरी करना चाहता है और जातक लग्नेश का रत्न पहनकर बल बढ़ाता है तोह जातक 100 प्रतिशत विदेश में बस कर नौकरी कर लेगा । लेकिन उसके साथ दुर्घटना, अस्पताल में भर्ती होने का योग भी बन जायेगा । यदि जातक ने किसी से झगड़ा आदि कर लिया तोह जेल जाने के योग भी साथ में बन जायेंगे क्यूँकि उस जातक ने अशुभ लग्नेश का बल बढ़ा दिया है जिसके कारण बारहवें भाव से जेल जाने के योग बन जायेंगे ।

हमारे अनुसन्धान के हिसाब से बारहवें भाव में बैठे लग्नेश का पाठ – पूजन, मंत्रजाप करना चाहिए । यदि स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएं तथा कर्ज सम्बन्धी समस्याएं अधिक आ रही हों तोह जातक को अशुभ लग्नेश का दान भी करना चाहिए । दान करने से ग्रह की अशुभता बहुत तेजी से कम होती है ।

यदि लग्नेश सूर्य से अस्त होकर कुंडली के बारहवें भाव में बैठता है तोह लग्नेश अशुभ नहीं माना जायेगा क्यूँकि अस्त ग्रह की किरणें हमारे शरीर पर पहुँचती ही नहीं हैं । अस्त की स्थित में लग्नेश को योगकारक ग्रह ही माना जाता है ।

यदि लग्नेश सूर्य से अस्त होकर कुंडली के किसी भी भाव में बैठता है तोह लग्नेश का रत्न 100 प्रतिशत अनिवार्य हो जाता है ।

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मैं, सोमवीर सिंह, अपने सभी पाठकों का दिल से हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ ।

इस पुस्तक (सेल्फ मेड डेस्टिनी) के माध्यम से आप सभी को ग्रहों के प्रभाव की जानकारी देने का प्रयास कर रहा हूँ । हमारे सूर्यमण्डल में अनगिनत ग्रह हैं जिनमे से 9 ग्रह ऐसे हैं जिनका प्रभाव सम्पूर्ण मानव जाति पर पड़ता है, सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि (वास्तविक ग्रह) और राहु, केतु (छाया ग्रह) इन सभी ग्रहों से हमारे शरीर पर किरणें पड़ती हैं और हमारे जीवन को प्रभावित करती हैं । कुछ ग्रहों से हमारे शरीर पर सकारात्मक किरणें पड़ती हैं और कुछ ग्रहों से नकारात्मक किरणें पड़ती हैं । सकारात्मक किरणों हमें जीवन में आगे बढ़ने में मदद करती हैं और नकारात्मक किरणें हमारे जीवन में परेशानी बढाती हैं । नकारात्मक किरणों के कारण हमारे शरीर में रोग, मानसिक परेशानी और पारिवारिक कलह कलेश बढ़ती है। यदि हम इन्ही नकारात्मक किरणों को नियंत्रित कर लें तोह हम सब अपनी परेशानियों को काफी हद तक कम कर सकते हैं ।

यदि हम अपने शरीर पर ग्रहों से आने वाली सकारात्मक किरणों को बढ़ा लेते हैं तोह हम अपने जीवन को खुशहाल बना सकते हैं और जीवन में काफी तरक्की कर सकते हैं। यदि हम ग्रहों से आने वाली किरणों से सम्बंधित कपड़े, रत्न (महत्वपूर्ण पथ्थर) धारण करते हैं तोह हमारे शरीर पर किरणों की तीव्रता काफी बढ़ जाती है। हमें सकारत्मक किरणों को बढ़ाना है और नकारात्मक किरणों को घटाना है। 

नकारात्मक किरणों को कम करने के लिए दो उपाय अपनाये जाते हैं: जल प्रवाह और दान

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1. जल प्रवाह: हमारे शरीर पर जिस ग्रह से नकारात्मक किरणें पड़ती हैं हम उस ग्रह से सम्बंधित वस्तुओं का जल प्रवाह करते हैं । हम सभी जानते हैं कि जब भी कोई वस्तु जल में डालते हैं तो उसकी ऊर्जा शांत हो जाती है क्यूंकि यह सृष्टि का नियम है कि यदि हम आग का गोला भी पानी में डालेंगे तो वह भी शांत होकर प्रभावहीन हो जायेगा । यदि हम अपने हाथों से ग्रह से सम्बंधित वस्तुओं को जल में प्रवाह करते हैं तोह उस ग्रह की नकारात्मक ऊर्जा हमारे शरीर से कम हो जाती है और हमें जीवन जीने में मदद करती हैं ।
2. दान-पुण्य: हमारे जीवन में दान का बहुत महत्त्व होता है जब भी हम दान करते हैं तोह कहीं न कहीं हम सामने वाले इन्सान की मदद करते हैं और साथ ही साथ अपनी भी मदद करते हैं इसलिए शास्त्रों में दान को ज्यादा महत्ता दी गई है । हम जब भी किसी ग्रह से सम्बंधित वस्तु को दान करते हैं तो इसका अर्थ यह हुआ कि जिस भी वस्तु का दान किया जाता है, उस ग्रह की किरणें हमारे शरीर से कम हो जाती हैं क्यूंकि यह भी सृष्टि का नियम है कि जो भी चीज आप बांटते हो वह आपके पास से कम हो जाती है । यह नियम रंग उपचार के नियमों में बहुत ही प्रमुख भूमिका निभाता है ।

जिस समय इन्सान का जन्म होता है उस वक्त सभी ग्रहों की किरणों का प्रभाव उसके शरीर पर पड़ता है वही प्रभाव उसकी जन्म कुंडली को दर्शाती है । यह विद्या उन्ही किरणों का प्रभाव जानकर उसके उपाय करके जातक का जीवन जीने लायक बनाती है । किरणों के प्रभाव से आपकी जो जन्म लग्न कुंडली बनती है उसी से आपके जीवन का निर्णय होता है।

  • भूल कर भी ऐसा कोई रत्न धारण न करें जिससे आपके शरीर पर नकारात्मक किरणें बढ़ें । रत्न का चयन करते समय सभी नियामों को ध्यान से पढ़े और लग्न कुंडली में ग्रहों के फल को पढ़ें, ग्रहों का अंश देखें, ग्रहों की स्थित लग्न कुंडली में जरूर देखें, इसके पश्चात् अस्त ग्रह देखें और बताये गए नियम के अनुसार रत्न का चयन करें ।
  • रत्न सदैव योगकारक ग्रह का ही धारण करें । एक योगकारक ग्रह भी अपनी स्थित के अनुसार मारक ग्रह बन जाता है । इसलिए रत्न धारण करते समय ग्रहों का अंश तथा ग्रहों की स्थित अवश्य देखें और बताये गए नियमों को अनुपालन करें ।

पितृ दोष के नाम पर भी समाज में कई भ्रम फैले हुए हैं । जो पितृगण अपनी सारी पूँजी और कमाई अपने बच्चों के लिए छोड़ गए, भला वे पितृ अपनी ही सन्तानों के लिए बुरा कैसे कर सकते हैं । उनके आशीर्वाद से तो सदैव वंशजों का भला ही हो सकता है ।

50 % कर्म और 50 % कुंडली के योग

हम सब अपने जीवन में 50 प्रतिशत कर्म और 50 प्रतिशत कुंडली के योग लेकर आए हैं। यदि कुंडली का सही ढंग से अध्यन किया जाए तोह हम सब अपना भाग्य तक बदल सकते हैं क्यूंकि हमारे पास 50 प्रतिशत कर्म है जिसके माध्यम से हम 50 प्रतिशत कुंडली के योग को बदल सकते हैं । हम सब को मारक ग्रह से आने वाली नकारात्मक किरणों को दान-पाठ पूजन और कर्म की मदद से कम करना है और अपने जीवन को सुखमय बनाना है ।

मेरे जीवन का सिर्फ एक ही उद्देश्य है कि मैं आम जनता के दुखों में काम आ सकूँ और उन्हें जीवन जीने की सही दिशा दिखा सकूँ । यदि आप अपने जीवन में नियमित रूप से मारक (शत्रु) ग्रहों का दान – पाठ पूजन करते रहते हैं और अपने योगकारक ग्रहों का रत्न के माध्यम से बल बढ़ा लेते हैं तोह आप अपनी किस्मत खुद लिखेंगे । क्यूंकि आपने अपने शरीर पर पड़ने वाली नकारात्मक ऊर्जा को नियंत्रित कर लिया है । यही नकारात्मक किरणें हमें जीवन में आगे बढ़ने से रोकती हैं और परेशानी देती हैं ।

आशा है कि इस पुस्तक (सेल्फ मेड डेस्टिनी) के सभी पाठकगणों को मैं ज्योतिष विद्या के सही मार्ग की ओर ले जा पाउँगा ।

भगवान श्री कृष्ण ने भगवत गीता में कर्म को सबसे ज्यादा महत्ता दी है, इन्सान कर्म के आधार पर अपना भाग्य तक बदल सकता है क्यूँकि हम सब इस पृथ्वी पर भाग्य (कुंडली के योग – 50 प्रतिशत) और अपना कर्म (50 प्रतिशत) लेकर आये हैं । मैंने अक्सर लोगों को कहते हुए सुना है कि जोह भाग्य में लिखा है वही होता है । ये बात 50 प्रतिशत सत्य है क्यूँकि इन्सान भाग्य और कर्म दोनों लेकर आया है । भविष्य में होने वाली घटनाएं हमारे कर्म से भी प्रभावित होती हैं और कर्म के आधार पर इन्सान अपने ग्रहों के प्रभाव को कम या ज्यादा कर सकता है।

यदि इन्सान सिर्फ भाग्य (किस्मत) लेकर आता तोह कर्म की महत्ता शून्य हो जाती। फिर इन्सान कर्म भी भाग्य के भरोसे करता । हम सब जानते हैं कि इन्सान जैसा कर्म करता है वैसा इसी जीवन में कभी न कभी अपने कर्म के फल को भोगता जरूर है । यदि इन्सान बुरा कर्म करता है तोह उसका बुरा फल भी जीवन में जरूर भोगता है क्यूँकि शनि ग्रह समय को चलायमान रखते हैं और इन्सान को कर्मो के आधार पर फल देते हैं । कर्म में इतनी शक्ति होती है कि इन्सान खुद अपनी किस्मत लिख सकता है ।

यदि आप अपनी किस्मत बदलना चाहते हैं तो सबसे पहले अपने ऊपर पड़ रहे ग्रहों के प्रभाव (किरणों) को समझिये और जानने की कोशिश कीजिये कि ऐसे कौन से ग्रह हैं जोह आपको जीवन में आगे बढ़ने में मदद करते हैं और कौन से ग्रह आपको परेशानी में डालते हैं । जो ग्रह आपको परेशानी में डालते हैं उनके प्रभाव को कम कीजिये (दान, पाठ पूजन, कर्म के माध्यम से) और जो ग्रह आपकी मदद करते हैं उनके प्रभाव को बढ़ा लीजिये (रत्न, रंग उपचार और कर्म के माध्यम से) ।

कर्म + भाग्य = हमारा जीवन

कर्म और भाग्य दोनों ही बदलते हैं । कभी हाथों की लकीरों को ध्यान से देखा है, हमारे हाथों की लकीरें समय के साथ – साथ घटती – बढ़ती रहती हैं । इसका सिर्फ एक ही अर्थ हो सकता है कि इन्सान अपने कर्मों से अपने भविष्य को बदल रहा है । यदि भविष्य बदला नहीं जा सकता तोह हाथों की लकीरें अपने आप घटती – बढ़ती क्यूँ रहती हैं ?

मैं इस पुस्तक (सेल्फ मेड डेस्टिनी) के माध्यम से सिर्फ ये बताना चाहता हूँ कि हम सब अपने जीवन में होने वाली घटनाओं को बदल सकते हैं और अपना जीवन सुखमय बना सकते हैं ।

कुछ बड़ा करना है तो अपनी राह खुद चुनो ।
भेड़ – बकरियों की तरह नहीं, शेर की तरह चलो ।।
कितना भी हो कठिन रास्ता, हर हाल में आगे बढ़ो ।
ये दुनिया तुम्हें डराएगी, सताएगी, रुलाएगी, हर रोज एक नया रूप दिखाएगी ।।
पर जिस दिन तुम अपनी मंजिल को पाओगे ।
तब यही दुनिया नाम तुम्हारा जपते – जपते पीछे – पीछे आएगी ।।

कुछ पाना है तो कुछ खोना होगा ।
हसना है तो रोना होगा ।।
चमकना है यदि सोने की तरह तो आग में खुद को तपाना होगा ।
बदलना चाहते हो अपनी किस्मत तो सबसे पहले खुद को बदलना होगा ।।

भूल जाओ तुम कौन हो, बस एक बात को ध्यान में रखो ।
सबसे पहला है अपना काम, बाकी सब उसके बाद रखो ।।

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